भाजपा महानगर अध्यक्ष कमलेश श्रीवास्तव डॉ. अनिल मिश्रा और सुभाष श्रीवास्तव का क्या है कनेक्शन और क्या है पूरी सच्चाई मुकदमा दर्ज होते ही खुली साइलेंट मोड सिंडिकेट की फाइल
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अंतरिक्ष तिवारी की कलम से
अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की पावन नगरी अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले में आज एक बेहद बड़ा मोड़ आ गया है। इस पूरे प्रकरण में आधिकारिक तौर पर शिकायत दर्ज कर ली गई है और पुलिस ने मुकदमा भी कायम कर लिया है। कानूनी विशेषज्ञों और स्थानीय प्रबुद्ध जनों का मानना है कि इस मुकदमे के दर्ज होने से अब उन सभी कड़ियों के साफ होने का रास्ता खुल गया है जो इस पूरे घटनाक्रम के पीछे रही हैं। हालांकि अयोध्या की जनता और जागरूक समाज के बीच इस समय सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यह तैर रहा है कि जिन बड़े और रसूखदार नामों की चर्चा सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में कई दिनों से बड़ी तेजी से चल रही थी उनमें से किसी भी एक बड़े नाम का जिक्र न तो लिखित शिकायत पत्र में है और न ही दर्ज मुकदमे में सामने आया है। इस बात को लेकर सुगबुगाहट तेज है कि किसी भी संवेदनशील मामले में छोटे कर्मचारियों को सामने रखने के बजाय पर्दे के पीछे के पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि राम मंदिर जैसे पवित्र और देश के सबसे प्रतिष्ठित परिसर की शुचिता पर कोई आंच न आए। सूत्रों के हवाले से इस पूरे प्रकरण में सुभाष श्रीवास्तव का नाम सामने आने के बाद कई तरह के प्रशासनिक सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर इस पूरी व्यवस्था की शुरुआत कहां से हुई थी
चर्चाओं और कयासों के बाजार को देखें तो सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में यह बात सबसे तेजी से उठ रही है कि पूर्व में एक बैंक कर्मचारी रह चुके सुभाष श्रीवास्तव की एंट्री राम मंदिर जैसे अति-संवेदनशील परिसर में किस प्रक्रिया के तहत हुई थी सूत्रों का दावा है कि बैंक सेवा में रहने के दौरान भी उक्त कर्मचारी का इतिहास विवादों से घिरा रहा है। ऐसे में दबी जुबान में लोग इस पूरी एंट्री की क्रोनोलॉजी को लेकर संगठनात्मक और प्रशासनिक स्तर के कुछ रसूखदार संदर्भों की तरफ इशारा कर रहे हैं। स्थानीय हलकों में चर्चा है कि भाजपा के महानगर अध्यक्ष कमलेश श्रीवास्तव के माध्यम से ही सबसे पहले राम मंदिर ट्रस्ट के सम्मानित सदस्य डॉक्टर अनिल मिश्रा से संपर्क स्थापित कराया गया था और उसी मजबूत पैरवी के बाद सुभाष श्रीवास्तव की मंदिर परिसर के भीतर धनगणना यानी चढ़ावे के पैसों की गिनती जैसी बेहद गोपनीय और महत्वपूर्ण ड्यूटी पर एंट्री कराई गई थी। इसके साथ ही, स्थानीय सूत्रों का यह भी दावा है कि महानगर अध्यक्ष कमलेश श्रीवास्तव का सुभाष श्रीवास्तव के घर पर अक्सर आना-जाना लगा रहता था और दोनों के बीच गहन संवाद होते थे। हालांकि इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है कि इन मुलाकातों और पैरवी के पीछे सीधे तौर पर किसकी क्या भूमिका थी लेकिन पारदर्शिता के लिहाज से स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि पुलिस और जांच एजेंसियां सुभाष श्रीवास्तव के घर के आसपास के सीसीटीवी कैमरों पड़ोसियों से पूछताछ और डॉक्टर अनिल मिश्रा व कमलेश श्रीवास्तव के कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स के जरिए कड़ाई से जानकारी जुटाएं तो जांच टीम को कई बेहद महत्वपूर्ण और तथ्यात्मक सबूत हाथ लग सकते हैं।
गौर करने वाली बात यह भी है कि जैसे ही यह पूरा मामला विवादों की जद में आया तब से सार्वजनिक तौर पर एक रणनीतिक दूरी भी देखने को मिल रही है, जिसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तरह-तरह के मायने निकाले जा रहे हैं। स्थानीय लोग कैमरे पर बोलने से भले ही बच रहे हों लेकिन ऑफ-कैमरा चर्चाओं में पारदर्शिता की मांग लगातार बढ़ रही है। जागरूक नागरिकों का कहना है कि सिर्फ मुकदमा दर्ज होना ही काफी नहीं है, बल्कि इस पूरे मामले की निष्पक्षता सिद्ध करने के लिए सभी संबंधित पक्षों के प्रॉपर्टी विवरणों की भी जांच होनी चाहिए। इस पूरे सिंडिकेट में राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य डॉक्टर अनिल मिश्रा को लेकर भी क्षेत्र में जबरदस्त चर्चाएं हैं। स्थानीय जानकार और खुद उनके कुछ करीबी भी इस बात से अचंभे में हैं कि यदि उनके पिछले कुछ वर्षों का पूरा रिकॉर्ड खंगाला जाए तो यह साफ हो जाएगा कि फर्श से अर्श तक पहुंचने की यह पूरी कहानी क्या है और उनकी संपत्तियों का ग्राफ अचानक बाहर कैसे बढ़ता चला गया। चर्चाएं तो यह भी हैं कि इस दौरान रसूख के दम पर अपनों और चहेतों को कहीं न कहीं सेट कर दिया गया। केवल डॉक्टर अनिल मिश्रा ही नहीं बल्कि सूत्रों के अनुसार महानगर भाजपा अध्यक्ष कमलेश श्रीवास्तव के बच्चों को भी मनचाही जगहों पर सेट करने की बात पुरजोर तरीके से कही जा रही है। अब जागरूक नागरिक यह सवाल उठा रहे हैं कि यह सब किस नियमावली और प्रक्रिया के तहत हुआ है इसकी भी गहन जांच होनी चाहिए ताकि समाज में किसी भी प्रकार का भ्रम न रहे।लोगों का मानना है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता ही सबसे बड़ी कसौटी होती है और हाथी के दांत दिखाने के कुछ और और खाने के कुछ और वाली कहावत किसी भी जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति पर चरितार्थ नहीं होनी चाहिए। इस पूरे मामले में देश के प्रधानमंत्री सूबे के मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे शीर्ष संगठनों की जो भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस और पूर्ण ईमानदारी की नीति रही है उस पर आम जनता का अटूट विश्वास है। यही वजह है कि खुद संगठन के निष्ठावान कार्यकर्ताओं का भी यह मानना है कि यदि कोई व्यक्ति संगठन की साख का दुरुपयोग करने का प्रयास करता है, तो शीर्ष नेतृत्व को उससे तुरंत दूरी बना लेनी चाहिए ताकि आगामी 2027 के चुनावों और संगठन की छवि पर इसका कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। सूत्रों के अनुसार इस पूरे विषय और स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों की एक विस्तृत जानकारी और लिखित संदर्भ सत्ताधारी दल के प्रदेश कार्यालय तक भी पहुंचने की खबरें हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लखनऊ का शीर्ष नेतृत्व इस पूरे घटनाक्रम और आज दर्ज हुए मुकदमे को संज्ञान में लेते हुए स्थानीय स्तर पर क्या सुधारात्मक कदम उठाता है। मर्यादा की इस पावन नगरी में शुचिता और न्याय की परंपरा हमेशा सर्वोपरि रही है इसलिए दोषी चाहे कोई भी हो सच सामने आना ही चाहिए। हमारी टीम पूरी जिम्मेदारी और निष्पक्षता के साथ इस संवेदनशील मामले के हर पहलू पर पैनी नजर बनाए हुए है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की असली प्रशासनिक और संगठनात्मक कड़ियां क्या हैं भाग-2 में और एक बड़ा खुलासा जल्द हम करेंगे।