राजनैतिक गलियारों में दावा: तेज नारायण पांडे पवन के भीतर करती है मंथरा की आत्मा वास अखिलेश परिवार में फूट डालने के आरोपों के बीच पुराने वफादारों ने कहा 2017 और 2022 की तरह 2027 का चुनाव भी ले डूबेंगे
========================================= अंतरिक्ष तिवारी की कलम से
अयोध्या की राजनीति में आज अचानक हलचल बढ़ गई जब समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडे पवन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधा। उन्होंने राम मंदिर परिसर में हुई कथित चोरी सुरक्षा व्यवस्था और राम मंदिर से जुड़े जमीन घोटाला मामले को लेकर सरकार को आक्रामक तरीके से घेरने की कोशिश की। लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद राजनैतिक विशेषज्ञों और विपक्ष के प्रबल व मजबूत नेताओं की तरफ से एक बहुत बड़ा पलटवार सामने आया है जिन्होंने पूर्व मंत्री के इस आक्रामक पैंतरे को केवल एक राजनैतिक ड्रामा और ध्यान भटकाने का जरिया करार दिया है। इसी कड़ी में, खुद उनकी ही पार्टी के लोग और अंदरूनी सूत्र भी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले से ही उन पर लगातार गंभीर सवाल उठाते आ रहे हैं। राजनैतिक जानकारों का कहना है कि दूसरों पर उंगली उठाने वाले इस नेता की अपनी राजनीति हमेशा नकारात्मक रही है। पार्टी के पुराने वफादारों का आरोप है कि इनके भीतर एक ऐसी कूटनीति काम करती है जिसने हमेशा अपनों को ही लड़ाया। सूत्रों का दावा है कि इन्होंने अपनी निजी महत्वाकांक्षा के लिए अखिलेश यादव के अपने परिवार में ऐसी फूट डाली जिससे पूरी पार्टी बिखर गई। नेताओं का कहना है कि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को जो करारी हार झेलनी पड़ी थी उसके पीछे भी इसी व्यक्ति की गलत रणनीतियों का सबसे बड़ा हाथ था। इसके बाद भी कई सीटों पर वरिष्ठ और जमीन से जुड़े नेता लगातार इनके खिलाफ शिकायत करते रहे, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने उनकी बातों को दरकिनार करते हुए इस चेहरे को लगातार आगे बढ़ाने का काम किया जिसे आज पार्टी के कई कद्दावर नेता आगामी 2027 के चुनाव के लिए भी आत्मघाती मान रहे हैं।जब जनता के बीच जाकर वोट मांगने की बारी आई तो अयोध्या की जनता ने इन्हें लगातार दो बार नकार दिया। साल 2017 के चुनाव में भी यह चुनाव हारे और साल 2022 के चुनाव में भी इन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। लगातार दो बार अपनी खुद की सीट न बचा पाने वाले इस चेहरे को लेकर अब सपा खेमे के ही पुराने वफादार चेहरे पहले से ही खुलकर कह रहे हैं कि जो चेहरा खुद नहीं जीत सकता वह आगामी 2027 का चुनाव भी पूरी तरह ले डूबेगा। इतना ही नहीं, चुनावी रणनीतिकारों का तो यहाँ तक कहना है कि इनका चुनावी रिकॉर्ड इस कदर प्रभावित हो चुका है कि यह जिस-जिस विधानसभा सीट पर पार्टी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने गए वहां-वहां समाजवादी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। स्थिति यह है कि स्थानीय नगर निगम के पार्षद और छोटे नेता भी इन्हें अपने चुनाव प्रचार से दूर रखने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। कुछ पार्षदों का तो यहाँ तक मानना है कि अगर चुनाव प्रचार में इनका पैर भी उनके इलाके में पड़ गया तो वे अपनी जीती-जिताती सीट भी हाथ से गंवा बैठेंगे। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि इस हकीकत को साबित करने के लिए किसी बड़े प्रमाण की जरूरत नहीं है कोई भी आम इंसान इंटरनेट या गूगल पर इनके पिछले दौरों और उन सीटों के नतीजों को सर्च करके इस जमीनी सच को खुद देख सकता है।स्थानीय लोगों और जमीनी कार्यकर्ताओं का खुला आरोप है कि इस चेहरे को असल में न तो अयोध्या के विकास से कोई मतलब है और न ही मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के दान पात्र या जमीन से जुड़े मामलों की कोई वास्तविक चिंता है। यह सब तो बस दोबारा किसी तरह विधायक और मंत्री बनने का सपना है ताकि फिर से सत्ता की कुर्सी पर बैठकर जनता के टैक्स के पैसों और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग किया जा सके। अयोध्या की जनता और स्थानीय नेताओं ने तो इन्हें एक बेहद कड़ी और खुली चुनौती देते हुए यहाँ तक कह दिया है कि तेज नारायण पांडे साल 2012 से लेकर साल 2026 तक यानी पिछले 14 सालों से अयोध्या की राजनीति में खुद को सक्रिय बताते हैं, लेकिन अगर वे आज अपनी पार्टी के केवल 500 सक्रिय कार्यकर्ताओं को भी वार्ड के हिसाब से पहचान कर उनके नाम सही-सही बता दें तो विरोधी हमेशा के लिए राजनीति करना छोड़ देंगे। असलियत यह है कि जमीन पर उनका कोई जनाधार नहीं बचा है वे सिर्फ बड़े वातानुकूलित होटलों में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना और केवल कागजी ज्ञापन सौंपना जानते हैं, इसके अलावा जमीनी संघर्ष से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।अंदरूनी सूत्रों ने उनके उस राजनैतिक चक्रव्यूह का भी सनसनीखेज पर्दाफाश किया है जिसके तहत जब भी समाजवादी पार्टी में अयोध्या जिले से कोई चाहे ब्राह्मण चेहरा हो या कोई अन्य जमीनी नेता आगे बढ़ने की कोशिश करता है, तो उसे कैसे पीछे धकेलना है और उसका ग्राफ कैसे नीचे गिराना है, इसके लिए यह नेता बहुत तेज रणनीति तैयार कर लेता है। सियासी हलकों में यह बात अब खुलकर कही जा रही है कि जब भी कोई नया चेहरा नेतृत्व की कतार में आता है, तो उसे दरकिनार करने का खेल शुरू हो जाता है। चूंकि इस व्यक्ति के भीतर साक्षात मंथरा की आत्मा वास करती है और मंथरा की लगाई आग व कानभरू बातों पर लोग बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं, यही वजह है कि इनकी इस आत्मघाती कूटनीति के जाल में फंसकर नेतृत्व को हर बार उत्तर प्रदेश की सत्ता से दूर होकर वनवास की ओर ही रहना पड़ रहा है। समाज को आपस में तोड़ना और केवल अपने कमजोर समर्थकों पर ही कृपा बरसाना इनकी पुरानी शैली रही है ताकि पार्टी में कोई दूसरा मजबूत चेहरा पनप ही न सके। सत्ता के रसूख का यह आलम रहा है कि जब लखनऊ में इनकी पार्टी के भीतर पारिवारिक कलह मची थी, तब इन्होंने खुद मंत्री पद पर सुरक्षित बने रहने के लिए अपनों को ही आपस में लड़ाने की खतरनाक बिसात बिछा दी थी। इसके साथ ही, आज अयोध्या का समाज यह मांग भी मजबूती से उठा रहा है कि पूर्व में मनोरंजन कर और वन विभाग जैसे प्रभावशाली मंत्रालयों में रहते हुए इनके और इनके करीबियों के कार्यकाल के दौरान जो आर्थिक विसंगतियां रहीं उसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कि किसने सत्ता की आड़ में कितनी अकूत संपत्ति बनाई।
सूत्रों का स्पष्ट कहना है कि मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के नाम पर आज कैमरे के सामने खड़े होने वाले इस नेता का असली चरित्र यह है कि वे खुद आज तक रामलला के भव्य दरबार में साक्षात दर्शन करने नहीं गए हैं। इतिहास गवाह है कि राम मंदिर के फैसले से लेकर भव्य प्राण प्रतिष्ठा तक जिस राजनैतिक खेमे ने हमेशा विरोध की राजनीति की आज उसी के नेता मीडिया के सामने आकर झूठी आस्था की दुहाई दे रहे हैं। स्थानीय लोग आज भी साल 2012 के उन भयानक धार्मिक दंगों को नहीं भूले हैं जब प्रशासनिक रसूख का इस्तेमाल कर एक खास तुष्टिकरण की नीति अपनाई जा रही थी जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। इतना ही नहीं सूत्रों ने इनकी चुनिंदा संवेदनशीलता पर भी बड़ा प्रहार किया है कि जब क्षेत्र में किसी गरीब या असहाय परिवार की महिला के साथ अन्याय होता है तो इनके मुंह पर रहस्यमयी पट्टी चिपक जाती है लेकिन राजनीतिक वोट बैंक चमकाने के लिए किसी विशेष वर्ग के मुद्दे पर ये तुरंत हमदर्दी का नाटक करने लगते हैं। ऐसे में आज अयोध्या की जनता यह साफ कह रही है कि राम के नाम पर केवल राजनीति चमकाने वाले इस चेहरे का न्याय अब जनता की अदालत ही तय करेगी। इसके विपरीत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रिकॉर्ड बार अयोध्या का दौरा करके संतों की सुध लेकर और बिना किसी भेदभाव के इस पावन धाम को वैश्विक पहचान दिलाकर यह साबित कर दिया है कि सच्ची भक्ति और लोक-कल्याण का संकल्प क्या होता है।