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अंतरिक्ष तिवारी की कलम से मेरी अंतिम इच्छा

कल जीवन का एक और वर्ष कम हो रहा है। प्रभु से मैंने हमेशा सिर्फ स्वाभिमान की मृत्यु और अपनी सत्यनिष्ठा की ताकत मांगी है। मुझे अपना सब कुछ गंवाना स्वीकार है यहाँ तक कि गोली खाना भी स्वीकार है। जब मैं किसी भी लड़ाई में उतरता हूँ
तो खुद को जीरो मानकर लड़ता हूँ; मैं खोने या पाने का हिसाब नहीं लगाता। मेरी सोच साफ हैजो डर गया वो गलत के खिलाफ जीते-जी मर गया; और मैं डरकर मरना नहीं चाहता। मैं तो अपनी सत्यनिष्ठा और संवैधानिक दायरे में रहकर लिखकर और बोलकर अपनी दहाड़ के साथ जीना और मरना चाहता हूँ।हो सकता है कि गलत करके इंसान यहाँ की न्यायपालिका से बच जाए, लेकिन ईश्वर की न्यायपालिका में जो दंड तय होता है, उसके बारे में हम सोच भी नहीं सकते। जिस दिन प्रभु की अदालत में अपराध सुनिश्चित हो जाएगा उस दिन दुनिया की कोई भी पावरफुल ताकत किसी को बचा नहीं पाएगी मुझे भी नहीं।इसलिए भारत के संविधान और अपनी सत्यनिष्ठा के दायरे में रहकर मेरी अंतिम इच्छा है कि मृत्यु के बाद मेरे शरीर का दाह-संस्कार न करके मेरा देहदान कर दिया जाए ताकि मेरे अंग किसी को नया जीवन दे सकें मेरी उपयोगी वस्तुएं जरूरतमंदों के काम आएं और चिकित्सा विज्ञान के छात्र मेरे शरीर पर शोध करके कुछ सीख सकें। बस यही मेरी अंतिम मनोकामना है।

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