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पहले प्रभु श्री राम की कुलदेवी माँ देवकाली की मूर्ति चोरी और फिर विसर्जन में भीषण दंगा क्या यही था सपा पूर्व विधायक पवन पांडे के कार्यकाल की सफलता या इसे कहें सीधे दैवीय नाराजगी आज कथित दान पात्र चोरी के शोर के बीच भी जारी है राम धुन और अनवरत दान


अंतरिक्ष तिवारी की कलम से
अयोध्या।राजनीति में जब जनता के सब्र का बांध टूटता है तो अतीत के पन्नों से वो सवाल बाहर आते हैं जिनका जवाब देना तत्कालीन सत्ताधीशों के लिए भारी पड़ जाता है। आज जब अयोध्या में मंदिर व्यवस्थाओं और दानपात्र को लेकर विपक्षी दलों द्वारा चौतरफा घेराबंदी की जा रही है तो अयोध्या की जनता ने समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक पवन पांडे के उस कार्यकाल का कच्चा चिट्ठा खोल दिया है जिसे इतिहास का एक काला अध्याय माना जाता है। एक निष्पक्ष और सजग पत्रकार के रूप में हमारा यह स्पष्ट मत है कि न हम सत्ता पक्ष के अंध समर्थक हैं और न ही विपक्ष के जो गलत होगा उसे तथ्यों के साथ जनता के समक्ष रखा जाएगा। इसी सिद्धांत के तहत आज अयोध्या की जनता पूर्व मंत्री पवन पांडे को सीधे निशाने पर लेते हुए उनके कार्यकाल के दो ऐसे बड़े कांडों पर जवाब मांग रही है जिन्होंने पूरी अयोध्या की आत्मा को हिलाकर रख दिया था।जनता का पहला आक्रोश उस दौर से जुड़ा है जब पवन पांडे क्षेत्र से विधायक बने थे सनातनी परंपरा में माना जाता है कि महाशक्ति से ही सृष्टि का अस्तित्व है। लेकिन इनके कार्यकाल की शुरुआत में ही प्रभु श्री राम की कुलदेवी माँ देवकाली के प्राचीन मंदिर से प्राण प्रतिष्ठित और सिद्ध अष्टधातु की मूल मूर्ति ही गायब कर दी गई। जब अयोध्या के सबसे बड़े आस्था केंद्र से सदियों पुरानी मूर्ति चोरी हो गई तब सत्ता के नशे में चूर पवन पांडे और उनके शासन-प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे थे। स्थानीय श्रद्धालुओं का आज भी रो-रोकर कहना है कि उस मूल मूर्ति के हटने से जो तेज और सिद्धि वहां से खत्म हुई उसे दोबारा धूमधाम से नई मूर्ति सिद्ध करने के बाद भी वापस नहीं लाया जा सका जिससे भक्तों का मन आज भी आहत है।माना जाता है कि कुलदेवी की मूर्ति चोरी होने से जो अमंगल हुआ उससे महादेवी स्वयं दुखी हो चुकी थीं और इसी वजह से आगे चलकर माता जी का मूर्ति विसर्जन भी सही ढंग से संपन्न नहीं हो पाया। इसी दैवीय नाराजगी और महापाप का भयानक परिणाम आगे चलकर देखने को मिला जब विसर्जन के दौरान पूरी अयोध्या भीषण दंगों की आग में झुलस गई। इस अशांति के जख्म अभी पूरी तरह भरे भी नहीं थे कि अयोध्या को मिले इन घावों ने जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया। जनता आज सीधे पवन पांडे से पूछ रही है कि क्या धार्मिक नगरी को दंगों की आग में झोंकने वाले अपराधियों को खुला संरक्षण देना और उन्हें कड़ा दंड न दे पाना ही आपके कार्यकाल की असली सफलता थी आज कानून व्यवस्था और नैतिकता पर लंबी-चौड़ी बातें करने वाले नेता जरा जनता को यह बताएं कि उस समय अपराधियों पर कौन सा बुल्डोजर चलवाया गया था कौन सी एसआईटी गठित की गई थी और किस अपराधी का हाफ या फुल एनकाउंटर किया गया था इन तमाम ऐतिहासिक घटनाक्रमों को देखते हुए आज अयोध्या की सनातनी जनता स्पष्ट रूप से मानती है कि इन लोगों और इनकी पार्टी को स्वयं भगवान भी पसंद नहीं करते हैं। सनातन इतिहास के सबसे बड़े और दर्दनाक अपराध चाहे वो रामभक्तों पर गोली चलवाने का कांड हो कार्यकाल की शुरुआत में ही कुलदेवी की मूर्ति चोरी होना हो विसर्जन के समय माता जी का विसर्जन सही से न हो पाना हो या फिर उसके बाद दंगे भड़कना हो ये सब सीधे तौर पर इन्हीं की सरकारों और इनके खुद के कार्यकाल के दौरान हुए हैं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि सांसारिक व्यवस्था में भी ईश्वर की कृपा इनसे कोसों दूर रही है।सनातनी विचारकों का मानना है कि जब-जब कोई बड़ा और पवित्र कार्य होता है, तो उसमें थोड़ी बहुत बाधा जरूर आती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाणिक उदाहरण द्वापर युग में मिलता है जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था तब पूतना भेष बदलकर न्योछावर मांगने आई थी लेकिन अंत में उस कपटी पूतना का क्या हश्र हुआ यह पूरी दुनिया जानती है। ठीक इसी प्रकार आज ट्रस्ट की व्यवस्था में भी अगर कुछ लोग भेष बदलकर राम सेवा के नाम पर अंदर घुस गए हैं और भक्तों के न्योछावर को लूटने का प्रयास कर रहे हैं तो ईश्वर श्रीकृष्ण की तरह इनका भी अंतिम फैसला तय कर देगा। लेकिन जिस तरह कान्हा के जन्मोत्सव पर यशोदा मैया दिल खोलकर न्योछावर लुटा रही थीं आज ठीक उसी प्रकार देश-विदेश का रामभक्त अयोध्या में न्योछावर लुटा रहा है। नियम है कि जो दिल से लुटाने वाला होता है वह कभी दुखी नहीं होता और न ही वह कोई सांसारिक हिसाब मांग रहा है। तो फिर राजनीति चमकाने वाले लोगों को इस पर बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।जनता का सीधा प्रहार है कि आज दानपात्र पर छाती पीटने वालों ने तो अपने समय में न्योछावर नहीं बल्कि सीधे रामभक्तों की जान का न्योछावर ले लिया था। जब प्राण-प्रतिष्ठित देवी की मूर्ति को ही चोर उठा ले गए विसर्जन भी शांति से न हो सका और पूरा शहर दंगों में जल गया तो यह सिद्ध हो गया कि न तो कुलदेवी आपको पसंद करती थीं और न ही प्रभु राम। यह सच है कि कलयुग के इस दौर में गंदी राजनीति और पाखंड का चोला ओढ़कर सत्ता तो हासिल की जा सकती है लेकिन ईश्वर और महादेवी की कृपा कभी नहीं मिल सकती क्योंकि उनकी अदालत में कर्मों का हिसाब एकदम तय है। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए मामलों को रफा-दफा कर सकती हैं लेकिन एक सच्चा सनातनी अतीत के इन जख्मों को कभी नहीं भूलता। ईश्वर की लाठी में आवाज नहीं होती है और उसका न्याय तय होता है जिसका फैसला अंततः जनता और शास्त्रीय विधान से ईश्वर के अदालत में होकर रहेगा।

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