अंतरिक्ष तिवारी की कलम से भाग 7 अयोध्या ।प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या में इस समय राजनीति बहुत गरमाई हुई है। पूर्व विधायक तेज नारायण पवन पांडे ने राम मंदिर के दानपात्र के पैसे को लेकर जो सवाल उठाए हैं उससे हर तरफ चर्चा शुरू हो गई है। लोकतंत्र का यह नियम बिल्कुल साफ है कि मंदिर के पैसे का हिसाब पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए और विसंगतियों पर सवाल उठाना बिल्कुल जायज है। लेकिन इस मामले में मेरी इनसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी या मनभेद नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से विचारों का मतभेद है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की पावन नगरी अयोध्या को एक ऐसा नेतृत्व चाहिए जो राम को मानता हो, रामलला के दर्शन करता हो और यदि मंदिर प्रशासन में कोई कमी हो तो एक सजग रामभक्त की तरह उन कमियों को भी प्रमुखता से उठाता हो, न कि मंदिर जाने से ही दूरी बना ले। जितना बड़ा अपराध प्रभु श्री राम के नाम पर ठगी करना है, उतना ही बड़ा अपराध प्रभु राम के मंदिर से विमुख होना भी है। इस नजरिए से देखा जाए तो दोनों ही पक्ष जनता की अदालत में एक जैसे गुनहगार नजर आते हैं।इस पूरे मामले में कथनी और करनी का जो विरोधाभास दिख रहा है, उसने जनता के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चाएं हैं कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी राम मंदिर से दूरी बनाए हुए हैं, जिसके पीछे उनके पिता के समय रामभक्तों पर हुए गोलीकांड के पुराने आरोप जोड़े जाते हैं। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश की जनता ने उन पर विश्वास जताया और उनकी सरकार भी बनाई। अखिलेश यादव की राजनीति पूरे उत्तर प्रदेश की है, उनके आराध्य भगवान श्री कृष्ण हो सकते हैं और राज्यस्तरीय समीकरणों के लिहाज से उनके लिए शायद यह विषय अलग हो, इसलिए जनता उन्हें एक बार को समझ सकती है।लेकिन जब बात पूर्व विधायक पवन पांडे की आती है, तो विरोधाभास गहरा हो जाता है। पवन पांडे स्वयं ब्राह्मण कुल से आते हैं, इसी अयोध्या नगरी के निवासी हैं और इसी अयोध्या विधानसभा से चुनाव लड़ते हैं जहां चौबीसों घंटे राम धुन गूंजती है। वे खुद को सनातनी बताते हैं, उनकी आस्था भी है, लेकिन फिर भी उनके मन में प्रभु श्री राम के मंदिर जाने को लेकर ऐसी विमुखता क्यों है जो नेता माथे पर बड़ा तिलक लगाते हैं और संतों के पैर छूते हैं उनकी आज तक भव्य मंदिर में दर्शन की एक भी तस्वीर सामने क्यों नहीं आई पवन पांडे आज प्रेस वार्ता करके करोड़ के घोटाले और दानपात्र की चोरी का मुद्दा प्रबलता से उठा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि यदि भ्रष्टाचार का इतना ही डर था, तो अभी तक उनके द्वारा कोई लिखित शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई गई यदि वे प्रभु श्री राम के मंदिर जाकर उनके चरणों में हाजिरी लगाते और अपनी अर्जी रखते, तो बात अलग होती। जो व्यक्ति खुद को भगवान के दरबार से इतना दूर रखता हो और मंदिर न जाने का रुख अपनाए हुए हो, उसे दानपात्र के पैसे पर सवाल उठाने का नैतिक हक कैसे मिल सकता हैअयोध्या की जनता और सच्चे सनातन प्रेमी सब समझ रहे हैं। यदि आस्था के नाम पर केवल इसी तरह चुनावी राजनीति होती रही, तो साल 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव में यहां के लोग ऐसे दोहरे चरित्र को सत्ता से दूर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। अयोध्या ने हमेशा उसी को अपनाया है जो बिना किसी स्वार्थ द्वेष या राजनीतिक ढोंग के प्रभु के चरणों में पूरी श्रद्धा से झुका है।