
अंतरिक्ष तिवारी की कलम से भाग-2
अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की पावन नगरी अयोध्या इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां आस्था, राजनीति और जवाबदेही के बीच गहरे सवाल तैर रहे हैं। राम मंदिर दानपात्र से जुड़े कथित वित्तीय गबन और पैसे निकालने के मामले ने आम जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। जनता के बीच उठ रहे इन तीखे और अनसुलझे सवालों को पत्रकारिता की निष्पक्ष कसौटी पर लाना हमारा परम कर्तव्य है क्योंकि जनता आज उन ताकतों से सीधे जवाब मांग रही है जो कल तक इस आंदोलन की अगुआ थीं।
जनता के बीच सबसे पहला सवाल यही गूंज रहा है कि जब देश की सर्वोच्च अदालत के माध्यम से राम मंदिर का ऐतिहासिक फैसला आया, तो इसका पूरा श्रेय राजनीतिक रूप से लिया गया। जब मंदिर व्यवस्था के संचालन के लिए न्यास का निर्माण हुआ, तो उसमें पूरी कमान सत्तारूढ़ दल के पीछे एक मजबूत दीवार की तरह खड़े रहने वाले चुनिंदा मातृ संगठनों के सिपहसालारों को सौंप दी गई। वैचारिक और सांस्कृतिक कड़ियों से जुड़े विशेष पदाधिकारियों को ही इस न्यास की सबसे महत्वपूर्ण कुर्सियों और पैसों के पूरे प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई जिस पर सनातनी समाज आनंदित भी था कि आंदोलन को सींचने वाले संगठन अब इसकी व्यवस्था संभालेंगे।
लेकिन आज जब करोड़ों भक्तों की गाढ़ी कमाई और गुप्त दान के रूप में आए चढ़ावे में कथित दान पेटी से धन चोरी और हेराफेरी के आरोप सामने आ रहे हैं तो जिम्मेदार लोग मीडिया के तीखे सवालों से बचते क्यों नजर आ रहे हैं जब इस गंभीर विषय पर मीडिया ने भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन के शीर्ष नेताओं से तीखे सवाल पूछे और उनकी प्रतिक्रिया मांगी, तो उनके द्वारा सीधे जवाब देने के बजाय टालमटोल भरा रुख अपनाया गया। मीडिया के सवालों के घेरे में आने पर प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और पार्टी नेतृत्व ने इस संवेदनशील विवाद से यह कहते हुए पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया कि यह सीधे तौर पर सरकार या पार्टी का विषय नहीं है बल्कि मंदिर के न्यास का आंतरिक मामला है और इसमें हम कुछ नहीं कर सकते। जब घोटाले का सवाल पूछा जाता हैतो इस गेंद को सीधे मंदिर के पाले में और न्यास के पाले में फेंककर छोड़ दिया जाता है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या आने वाले कल में ये लोग फिर से मंदिर के नाम पर जनता के बीच वोट मांगने नहीं जाएंगे जनता को भी आज अपनी अदालत में यही तीखा सवाल करना चाहिए कि जब आस्था के केंद्र में यह सब हो रहा था, तब नेताओं की आंखों पर कौन सी पट्टी बंधी थी आपके प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और अन्य बड़े सूरमा इस गंभीर मुद्दे पर बोलने से पूरी तरह मौन क्यों साधे हुए हैं इस रहस्यमयी चुप्पी के पीछे की असली कहानी क्या है, जनता अब सब समझ रही है।
यह इतिहास गवाह है कि कई हजार वर्षों के संघर्ष में राम मंदिर के लिए अनगिनत लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, न जाने कितनी माताओं की गोद सूनी हुई और कितनी बहनें-बहुएं असमय विधवा हो गईं। कोलकाता से आए युवा कोठारी बंधुओं जैसे अनगिनत कारसेवकों और संतों ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। यहाँ तक कि संघर्ष के दिनों के जो असली और सच्चे आंदोलनकारी थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इस कारसेवा और आंदोलन में खपा दी आज उन्हें न तो इस भव्य न्यास में कोई जगह मिली लेकिन धन्य है उनकी भक्ति और प्रभु के प्रति निश्छल प्रेम कि वे हाशिए पर धकेले जाने के बाद भी राम काज को देखकर केवल इस बात से प्रसन्न थे कि उनकी आँखों के सामने आखिरकार प्रभु श्री राम का मंदिर बन रहा है। उनकी आँखों में केवल संतोष और हर्ष के आंसू थे उन्हें अपने लिए किसी पद प्रतिष्ठा या व्यवस्था की कोई लालसा नहीं थी।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जिन लोगों ने सच में अपना सब कुछ न्योक्षावर कर दिया उनके नाम पर आज अयोध्या में एक अदद चौराहे तक का निर्माण नहीं हुआ जबकि दूसरी तरफ लता मंगेशकर चौक जैसी भव्य संरचनाएं बनाई गईं। इसके विपरीत जिन लोगों को आज मंदिर की व्यवस्था और संचालन का अवसर मिला है, उनकी और उनके करीबियों की आर्थिक स्थिति को लेकर जनता गंभीर सवाल उठा रही है। लोग पूछ रहे हैं कि मंदिर व्यवस्था से जुड़ने से पहले उनकी आर्थिक स्थिति क्या थी और आज उनके रिश्तेदारों, मित्रों सहयोगियों और यहाँ तक कि चालकों के पास अचानक जमीन मकान होटल दुकान और अकूत संसाधनों की व्यवस्था कहाँ से आई क्या ये लोग प्रभु श्री राम की सेवा करने आए थे या राम नाम पर मेवा खाने आए थे अब तो इन्हें प्रभु श्री राम से भी डर नहीं लग रहा है।सूत्रों और स्थानीय हिंदूवादी संगठनों के माध्यम से यह गंभीर आरोप भी सामने आ रहे हैं कि मंदिर परिसर में जो निजी सुरक्षा एजेंसियां और अन्य व्यवस्थाएं लगाई गई हैं, उनके आवंटन में भारी धांधली की गई है। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि जिन रसूखदारों के माध्यम से इन निजी एजेंसियों को काम दिया गया है, उनसे हर महीने लाखों रुपये का सुविधा शुल्क यानी कमीशन वसूला जा रहा है। तमाम हिंदूवादी संगठनों ने इस व्यवस्था के खिलाफ गहरा रोष प्रकट किया है और सड़कों पर उतरने की चेतावनी दी है। जनता की अब स्पष्ट मांग है कि यदि यह मामला पूरी तरह न्यास का है और पार्टी नेता भी यही बोल रहे हैं तो वर्तमान समिति को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाना चाहिए और इसकी जगह देश के सेवानिवृत्त पूर्व न्यायाधीशों की एक निष्पक्ष समिति बनाई जानी चाहिए ताकि राम काज और सनातन आस्था पूरी तरह पारदर्शी रहे। जनता यह भी सवाल कर रही है कि क्या देश की बड़ी जांच एजेंसियां जैसे ईडी और सीबीआई की नियमावली सिर्फ आम जनता विपक्ष या सवाल पूछने वालों के घरों तक पहुंचने के लिए ही बनी है अगर आरोपी सच में सच्चे रामभक्त और बेदाग हैं, तो वे इन आरोपों की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने से क्यों कतरा रहे हैं दूध का दूध और पानी का पानी होना बेहद जरूरी है, क्योंकि इस बार मामला सिर्फ दाल में कुछ काला होने’ का नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली होने का लग रहा है। अभी तो बहुत से उस गुप्त दान का ब्योरा भी आना बाकी है जिसकी लोग रसीद तक नहीं लेते जिसका लेखा-जोखा बहुत जल्द सामने आएगा।इस पूरे विवाद के बीच देश-विदेश के रामभक्तों और हिंदूवादी संगठनों ने न्यास के सामने कुछ ऐसे बुनियादी और तार्किक सवाल रख दिए हैं जिन्हें सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा’ बताकर कतई खारिज नहीं किया जा सकता। यह मांगें विशुद्ध रूप से प्रशासनिक और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़ी हैं, जिनका डेटा सार्वजनिक होना हर सनातनी का अधिकार और परम कर्तव्य है। पहली मांग यह है कि न्यास की वेबसाइट पर एक ऑनलाइन डिजिटल डैशबोर्ड होना चाहिए, जहां हर दिन का अपडेटेड वित्तीय लेखा-जोखा और रसीदें पारदर्शी तरीके से उपलब्ध हों, ताकि सनातन प्रेमी अपने दिए दान के अधिकार को जान सकें। इसके साथ ही मंदिर के उन सभी प्रशासनिक और वित्तीय काउंटरों को, जहां धन का लेन-देन होता है, चौबीसों घंटे लाइव सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में रखा जाए और उसकी रिकॉर्डिंग का स्वतंत्र डिजिटल बैकअप हो। इसके अलावा मंदिर व्यवस्था को चलाने के लिए कुल कितने अधिकारी, लिपिक, सेवादार और सफाई कर्मी तैनात हैं, उन सभी कर्मचारियों की पूरी सूची योग्यता और मानदेय के नियमों के साथ ऑनलाइन होनी चाहिए। परिसर में कितनी और कौन सी निजी सुरक्षा कंपनियां लगी हैं उनके चयन की टेंडर प्रक्रिया और अनुबंध की शर्तों का डेटा भी सनातन प्रेमियों के पास होना चाहिए। यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि इसमें सुरक्षा के संवेदनशील ब्लूप्रिंट या हथियारों की गुप्त जानकारी नहीं मांगी जा रही है, बल्कि केवल वित्तीय टेंडर और वेंडर्स की सूची मांगी जा रही है, इसलिए इसे सुरक्षा के लिए खतरा बताकर छुपाया नहीं जा सकता। साथ ही प्रभु श्री राम मंदिर ट्रस्ट के द्वारा समाज-कल्याण के लिए क्या-क्या सेवाएं जैसे निःशुल्क भंडार चिकित्सा केंद्र या गौशालाएं चलाई जा रही हैं उन सब चीजों का पूरा ब्योरा भी जनता के सामने आना चाहिए।अयोध्या की जनता और विश्व भर के करोड़ों सनातनियों की आस्था इस बात पर अडिग है कि यह मर्यादा पुरुषोत्तम की नगरी है। यहाँ का मानवीय सिस्टम भले ही किसी को बचा ले जाए, लेकिन विधाता के न्याय में सिर्फ सत्य चलता है और वहां ऐसा दंड मिलेगा कि कई पुश्तें याद रखेंगी। यदि त्रेतायुग में स्वयं जगतजननी सीता जी को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी, तो आज खुद को सच्चे सनातनी बताने वाले इन पदाधिकारियों को जांच और पारदर्शिता की अग्नि परीक्षा से गुरेज क्यों होना चाहिए एक सच्चे कलमकार के रूप में मैंने यह संकल्प ले लिया है कि जब तक सांस है, सच को इसी तरह पूरी निडरता के साथ सामने लाता रहूंगा चाहे इसके बदले जेल जाना पड़े या मौत उपहार में मिले सच्चाई लाने से पीछे नहीं हटेंगे।भाग 3 में पढ़िए: न्यास ट्रस्ट के एक बेहद करीबी व्यक्ति की फर्श से अर्श तक की कहानी तीसरे भाग में कुछ और नया पढ़िए।