

अयोध्या के नगर निगम अंतर्गत आचार्य नरेंद्र वार्ड में चल रहा नाली निर्माण कार्य इन दिनों प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की गंभीर भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। शासन की मंशा और जिलाधिकारी व नगर आयुक्त के सख्त आदेशों के बावजूद, धरातल पर निर्माण की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं वे किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रही हैं। वार्ड में नाली निर्माण के लिए स्पष्ट नियमावली है कि 4:1 के मसाले का उपयोग और अव्वल दर्जे की ईंटों का इस्तेमाल हो, लेकिन हकीकत दावों से कोसों दूर है। स्थानीय पार्षद अनूप श्रीवास्तव ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें निर्माण में हो रही मनमानी के बारे में जानकारी थी और उन्होंने अधिकारियों को अवगत भी कराया था, बावजूद इसके हालात नहीं बदले। इस पूरे मामले में जब निर्माण की देखरेख के लिए जिम्मेदार जेई अमित जायसवाल से मानक पूछे गए, तो उन्होंने ‘4:1’ के मसाले और ‘अव्वल ईंट’ का रटा-रटाया जवाब तो दे दिया, लेकिन जैसे ही उनसे यह सवाल किया गया कि मौके पर इन मानकों का पालन क्यों नहीं हो रहा है और वीडियो-फोटो साक्ष्य देखने का आग्रह किया गया, तो वे सवालों का सामना नहीं कर पाए। जेई साहब ने बात पूरी होने से पहले ही फोन काट दिया। हद तो तब हो गई जब जवाबदेही से बचने के लिए उन्होंने दोबारा कॉल उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। सवालों से इस तरह भागना यह साबित करता है कि वे न केवल जवाबदेही से कतरा रहे हैं, बल्कि अपनी गलतियों को छुपाने के लिए जानबूझकर जनता और मीडिया से दूरी बना रहे हैं। जेई साहब की इस चुप्पी ने जनता के बीच कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि क्या नाली का निर्माण पुरानी संरचना को खोदकर किया जा रहा है या पुरानी नाली के ऊपर ही नई जुड़ाई की जा रही है? यदि नाली के ऊपर नाली बन रही है, तो क्या यह तकनीकी रूप से सफल और टिकाऊ होगी? वार्ड में कुल कितनी नाली नई बननी हैं और कुल कार्य की लंबाई क्या है? क्या स्वीकृत बजट और कार्य की वास्तविक गुणवत्ता में कोई तालमेल है? जब मुख्यमंत्री के स्पष्ट आदेश हैं कि निर्माण कार्य पूरी पारदर्शिता और मानक के साथ हो, तो क्या जेई साहब को इन आदेशों की अनदेखी करने की खुली छूट मिली है? क्या ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए अधिकारियों द्वारा जानबूझकर गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है? आखिर नगर निगम का बजट आम जनता की सुविधा के लिए है या ठेकेदारों की जेब भरने के लिए? आचार्य नरेंद्र वार्ड की जनता अब देख रही है कि आधे से ज्यादा निर्माण पूरा हो चुका है। अब सवाल यह है कि बचे हुए हिस्से में क्या प्रशासन कोई सुधार करेगा, या फिर कागजी खानापूर्ति के जरिए भ्रष्टाचार की इस फाइल को भी दबा दिया जाएगा? नगर आयुक्त और डीएम साहब के सख्त आदेशों के बावजूद जेई साहब की यह ‘गर्मी’ और सवालों से भागने की आदत कहीं न कहीं विकास के दावों की धज्जियां उड़ा रही है। अब देखना यह है कि इस भ्रष्टाचार पर लीपा-पोती होती है या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जाती है।