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सत्ता की हनक या ब्राह्मण विरोध का नशा बरेली के बंधक मजिस्ट्रेट और लखनऊ वाले उस फोन का सच

अंतरिक्ष तिवारी तिवारी की कलम से
उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों जो कुछ घट रहा है वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है लेकिन इसके किरदार असली हैं और उनका दर्द भी। सवाल बड़ा है कि क्या उत्तर प्रदेश में अब अधिकारियों की निष्ठा उनकी जाति से तय होगी क्या विरोध की आवाज उठाने वाले किसी ‘पंडित’ को सत्ता के गलियारों में ‘पागल’ करार दे दिया जाएगा। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे और उसके बाद के घटनाक्रम ने शासन की नैतिकता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला केवल एक इस्तीफे का नहीं है बल्कि उस जमीर का है जो यूजीसी (UGC) के विवादित नियमों और प्रयागराज में ब्राह्मण बटुकों की चोटी खींच-खींचकर पीटे जाने के विरोध में जाग उठा था। लेकिन इस जमीर की कीमत अलंकार अग्निहोत्री को ‘बंधक बनकर चुकानी पड़ी। आरोप बेहद संगीन हैं एक तरफ डीएम अविनाश सिंह का आवास और दूसरी तरफ लखनऊ से आता वह रहस्यमयी फोन कॉल। अग्निहोत्री का दावा है कि उन्होंने अपने कानों से वह बातचीत सुनी जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी झकझोर देने वाली है। उनके अनुसार जिलाधिकारी के मोबाइल पर लखनऊ से आए फोन पर दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति गरज रहा था कि साला पंडित पागल हो गया है। इस साले को रात भर अपने आवास में बंधक बनाकर रखो। इस साले को जाने मत देना। यह संवाद केवल अपशब्द नहीं है, बल्कि उस सामंती सोच का प्रमाण है जो सत्ता की खिड़की से एक हाते की तरह झांक रही है। जब रक्षक ही भक्षक की भाषा बोलने लगें और खाकी वर्दी बटुकों की चोटी का अपमान करने लगे तब एक अधिकारी का इस्तीफा देना व्यवस्था को आईना दिखाने जैसा है। मगर बदले में उसे गाली और बंधक बनाए जाने का इनाम मिलना इस बात की तस्दीक करता है कि उत्तर प्रदेश में ‘ब्राह्मण विरोध’ का नशा अब सिर चढ़कर बोल रहा है।सूत्रों की मानें तो यह घटना योगी सरकार के लिए किसी ‘खतरे की घंटी’ से कम नहीं है। शासन के गलियारों में चर्चा है कि जिस प्रकार सवर्णों विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ जातिवादी टेक हावी हो रहा है उससे सरकार के भीतर ही दो फाड़ की स्थिति बन रही है। सूत्र बताते हैं कि हाल के दिनों में कई ब्राह्मण जनप्रतिनिधियों की नाराजगी और समुदायों के बीच बढ़ते असंतोष ने मुख्यमंत्री कार्यालय की चिंता बढ़ा दी है। विपक्ष अब इस मुद्दे को लपक चुका है और सीधे आरोप लगा रहा है कि प्रदेश में एक खास वर्ग के वर्चस्व के नाम पर अन्य वर्गों, विशेषकर ब्राह्मणों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूजीसी नियमों को लेकर सामान्य वर्ग का गुस्सा और बटुकों के साथ हुई अभद्रता ने आग में घी डालने का काम किया है। गूगल और अन्य प्लेटफार्मों पर मौजूद जानकारियों के अनुसार योगी सरकार के खिलाफ अब यह धारणा बलवती हो रही है कि ब्यूरोक्रेसी में एकतरफा जातिवाद हावी है जो आने वाले चुनावों में भाजपा के कोर वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है। यदि समय रहते इन ‘लखनऊ वाले फोन कॉल्स’ और अधिकारियों के मानसिक उत्पीड़न पर लगाम नहीं लगाई गई तो आने वाले समय में ब्यूरोक्रेसी का यह असंतोष सत्ता के सिंहासन को हिला सकता है। अलंकार अग्निहोत्री का यह आरोप सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि उस सिस्टम के मुंह पर तमाचा है जो अपनों को ही अपमानित करने की फैक्ट्री बन चुका है। क्या मुख्यमंत्री इस अज्ञात रसूखदार की शिनाख्त करेंगे या फिर स्वाभिमान की इस आवाज को फाइलों के नीचे दबा दिया जाएगा जवाब का इंतजार प्रदेश का हर वो शख्स कर रहा है जिसे अपनी परंपरा और अपने आत्मसम्मान पर नाज है।

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