अयोध्या की मिल्कीपुर तहसील में इन दिनों न्याय का एक ऐसा ‘अनोखा मॉडल’ चल रहा है, जिसे देखकर बड़े-बड़े कानूनविद भी अपना सिर पकड़ लें। यहाँ एक विधवा महिला को यह साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ रहा है कि वह इसी दुनिया की निवासी है और किसी की पत्नी थी। व्यवस्था का आलम यह है कि साहबों की मेज पर दस्तावेज़ों का पहाड़ तो है, लेकिन उनकी आँखों पर ‘संदेह का चश्मा’ इतना गाढ़ा है कि उन्हें सच के सिवाय सब कुछ दिखाई दे रहा है।तहसीलदार का आदेश और एसडीएम साहब की रिपोर्ट दोनों के बीच की जुगलबंदी किसी सस्पेंस फिल्म से कम नहीं है। यहाँ जाँच बाद में होती है और ‘साहब’ का निष्कर्ष पहले ही टाइप होकर तैयार रहता है। शायद प्रशासन ने यह मान लिया है कि विधवा होना ही अपने आप में सबसे बड़ा सबूत है कि महिला गलत ही होगी। कागज़ों की इस बाजीगरी में इंसान की आवाज़ को फाइलों के नीचे दबा देना ही यहाँ की नई कार्यशैली बन गई है।सबसे मजेदार बात तो यह है कि सरकारी विज्ञापनों में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘नारी शक्ति’ के नारे जिस शोर से गूँजते हैं, मिल्कीपुर की गलियों में आकर वे उतने ही खामोश हो जाते हैं। यहाँ सिस्टम यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे सबूतों पर यकीन करना है या अपनी ‘दिव्य दृष्टि’ पर। क्या प्रशासन का काम केवल कागज़ों की गिनती करना रह गया है, या उन कागज़ों के पीछे छिपी एक महिला की बेबसी को समझना भी उनकी तनख्वाह का हिस्सा हैअब सबकी नज़रें अयोध्या के ज़िलाधिकारी पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या वे इस प्रशासनिक प्रहसन कॉमेडी को रोकेंगे, या फिर वे भी उसी ढर्रे पर मुहर लगा देंगे जहाँ न्याय केवल रसूखदारों की दासी बना बैठा है? अगर इस बार भी न्याय की कुर्सी खामोश रही, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र के इस मंदिर में ‘इंसानियत’ का विसर्जन हो चुका है और अब केवल ‘फाइलों का राज’ बचा है।मिल्कीपुर का यह मामला चेतावनी हैआज अगर एक विधवा कटघरे में है, तो कल आपकी बारी भी आ सकती है, क्योंकि यहाँ न्याय अंधा नहीं बल्कि बहरा भी हो चुका है।