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ओपीडी से गायब, तड़पते मरीज और रणनीति में व्यस्त डॉक्टर: ऑन-ड्यूटी डॉ. आशीष श्रीवास्तव की लापरवाही पर कब होगा मुकदमा

पत्रकार अंतरिक्ष तिवारी की कलम से
अयोध्या की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर काबिज रसूखदार चेहरों की संवेदनहीनता आज पूरी तरह बेनकाब हो गई है। आईएमए (IMA) के अध्यक्ष डॉ. आशीष श्रीवास्तव की कार्यशैली ने न केवल चिकित्सा जगत को शर्मसार किया है, बल्कि पीड़ित जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम भी किया है। पूरा मामला डॉ. आर.के. बनौधा के निर्मला अस्पताल की लापरवाही से जुड़ा है, लेकिन डॉ. आशीष श्रीवास्तव का रवैया ऐसा है जैसे वे सरकारी चिकित्सक न होकर किसी प्राइवेट अस्पताल के प्रवक्ता हों। रविवार को डॉ. आशीष श्रीवास्तव ने निर्मला अस्पताल के समर्थन में एक प्रेस वार्ता आयोजित की, जिसमें उन्होंने उस मासूम बच्चे के प्रति संवेदना का एक शब्द भी नहीं निकाला जिसने अपनी मां को इसी अस्पताल की लापरवाही की भेंट चढ़ते देखा। संवेदना व्यक्त करने के बजाय डॉ. आशीष श्रीवास्तव आरोपी की झड़ी लगा देते हैं और उनकी हंसी यह चीख-चीख कर बता रही थी कि उन्हें आम आदमी की पीड़ा और आंसुओं से कोई सरोकार नहीं है।घटना का दूसरा और सबसे गंभीर पहलू सोमवार को सामने आया। सरकारी नियमावली के स्पष्ट निर्देश हैं कि अयोध्या के जिला अस्पतालों में ओपीडी का समय सुबह 8:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक निर्धारित है और इस दौरान डॉक्टरों को अपनी कुर्सी पर मौजूद रहना अनिवार्य है। लेकिन सोमवार को जब अस्पताल की ओपीडी में मरीजों का सैलाब उमड़ा था, लोग दर्द से कराह रहे थे, रो रहे थे और घंटों से लाइन में लगकर डॉक्टर साहब का इंतजार कर रहे थे, तब डॉ. आशीष श्रीवास्तव लगभग 2 घंटे तक अपनी ड्यूटी से रहस्यमयी ढंग से गायब रहे। सूत्र बताते हैं कि डॉ. आशीष श्रीवास्तव उस समय कचहरी में मौजूद थे और निर्मला अस्पताल को बचाने के लिए रणनीति तैयार करने के साथ-साथ ज्ञापन देने की तैयारी में व्यस्त थे। सोशल मीडिया पर उनकी कचहरी में मौजूदगी की कुछ फोटो भी तेजी से वायरल हो रही हैं, हालांकि ये फोटो उसी समय की हैं या नहीं, इसकी पुष्टि हम नहीं करते, लेकिन डॉ. आशीष श्रीवास्तव की ऑन-ड्यूटी अनुपस्थिति और उस दौरान मरीजों की तड़प एक कड़वा सच है।यहाँ सवाल लोकतंत्र और न्याय की दोहरी व्यवस्था पर भी उठता है। अक्सर देखा जाता है कि यदि डॉ. आशीष श्रीवास्तव ड्यूटी पर मरीज देख रहे हों और उस वक्त कोई पीड़ित या तीमारदार उनसे कोई सवाल पूछ ले तो डॉक्टर साहब तुरंत भड़क जाते हैं। वे तर्क देते हैं कि “मेरे मरीज की हालत खराब हो रही है, मेरा समय बर्बाद हो रहा है” और सवाल पूछने वाले पर तत्काल ‘सरकारी कार्य में बाधा’ डालने के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया जाता है। क्या लोकतंत्र सिर्फ रसूखदारों की सुरक्षा के लिए है? क्या इन डॉक्टरों के लिए कोई लोकतंत्र और कोई नियम नहीं है? जब जनता के टैक्स से मोटी सैलरी पाने वाले डॉ. आशीष श्रीवास्तव स्वयं ऑन-ड्यूटी 2 घंटे गायब रहकर जनता का कीमती समय बर्बाद करते हैं और स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते हैं, तो उन पर अब तक मुकदमा क्यों नहीं हुआ। क्या उन पर जनता के समय की चोरी और लापरवाही के विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।हैरानी की बात तो यह है कि जब डॉ. आशीष श्रीवास्तव अस्पताल लौटकर आते हैं, तब भी मरीजों को प्राथमिकता देने के बजाय वे अपने कक्ष के भीतर ‘वीआईपी मूवमेंट’ और राजनीतिक चर्चाओं में व्यस्त हो जाते हैं। अंदर बैठकर हंसी-ठिठोली और राजनीति होती है, जबकि बाहर जनता अपने नंबर के लिए बिलखती रहती है। अगर डॉ. आशीष श्रीवास्तव को प्राइवेट सेक्टर के डॉक्टरों के सम्मान और उनके अस्पतालों को बचाने की इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिली हुई है, तो उन्हें सबसे पहले सरकारी अस्पताल की सेवा से रिटायरमेंट ले लेना चाहिए और उसके बाद पूरी शिद्दत से राजनीति और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।अयोध्या के उच्च अधिकारियों से पुरजोर निवेदन है कि सोमवार के दिन डॉ. आशीष श्रीवास्तव जिस कमरे में बैठते हैं, वहां की सीसीटीवी फुटेज की सघन जांच की जाए। उनके मोबाइल की लोकेशन निकाली जाए कि वे ड्यूटी के घंटों के दौरान कहां-कहां सक्रिय थे। यदि डॉ. आशीष श्रीवास्तव स्वयं को ईमानदार और जनसेवक समझते हैं, तो उन्हें अपनी और अपने रिश्तेदारों की संपत्ति का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक कर देना चाहिए, ताकि ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो सके। पीड़ित जनता की आह अब एक बड़ी लड़ाई का रूप लेगी। यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कि जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले ऐसे रसूखदारों को उनके किए की सजा नहीं मिल जाती। डॉ. आशीष श्रीवास्तव जी उत्तर की अभिलाषा रहेगी, क्योंकि ईश्वर की लाठी बेआवाज होती है और सत्य को परेशान तो किया जा सकता है, लेकिन पराजित नहीं।

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