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तीखे सवालों पर बिदके कृषि मंत्री: प्रेस संवाद या सिर्फ सरकारी बखान अधिकारियों के भरोसे रहे तो 2027 में फिर डूबेगी नैया


अंतरिक्ष तिवारी की कलम से
अयोध्या।कहते हैं लोकतंत्र में जनता के सवाल सबसे ऊपर होते हैं और उन सवालों को सरकार तक पहुँचाने का काम मीडिया का होता है। लेकिन आज अयोध्या में कृषि मंत्री की प्रेस वार्ता के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसने इस व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। लगभग 15 मिनट तक बंद कमरे में उपलब्धियों का कसीदा पढ़ा गया देश-प्रदेश के विकास के कागजी आंकड़े गिनाए गए लेकिन जैसे ही पत्रकारों ने जमीनी हकीकत को लेकर क्रॉस-सवाल दागना शुरू किया, माननीय मंत्री जी के तेवर बदल गए। साफ तौर पर ऐसा लगा कि मंत्री जी प्रेस से संवाद करने नहीं बल्कि अपना एकतरफा भाषण सुनाने आए थे, जहाँ पत्रकारों से सिर्फ ताली बजाने और सरकारी पर्चा छापने की उम्मीद की जा रही थी।जब पत्रकारों ने पूरी मुखरता के साथ किसानों से जुड़े खेत बचाओ अभियान” पर सवाल पूछा तो मंत्री जी जवाब देने के बजाय बगलें झांकते नजर आए। अधिकारियों को जमीन पर उतारने और उनकी लापरवाही पर कार्रवाई करने के सवाल को गंभीरता से लेना तो दूर मंत्री जी ने उस पर बात करना भी सही नहीं समझा। इसके अलावा यश पेपर मिल का मुद्दा हो या पिछले 7 सालों में कृषि क्षेत्र के बीच की गई चौपालों की वास्तविक संख्या का हिसाब हर तीखे सवाल पर माननीय चुप्पी साध गए या बात को टाल गए। क्या आज के दौर में मंत्रियों को सिर्फ हाँ में हाँ मिलाने वाले लोग पसंद हैं क्या तीखे और निष्पक्ष सवाल पूछने वाले पत्रकारों को झूठी जांच या मुकदमों में फंसाने का डर दिखाकर चुप कराया जाएगा अगर मंत्रियों को तीखे सवाल पसंद नहीं हैं तो फिर वे प्रेस के सामने आते ही क्यों हैं मंत्री जी की इस हाई-प्रोफाइल बैठक और जमीनी पकड़ का सबसे मजेदार और हैरान करने वाला सच तब सामने आया जब कार्यक्रम में मौजूद महिलाओं से बात की गई। जमीनी हकीकत यह थी कि वहाँ बुलाई गई महिलाओं को यह तक मालूम नहीं था कि वे किस लिए आईं हैं। कुछ महिलाओं ने कैमरे पर बेबाकी से कुबूल किया कि उन्हें तो सिर्फ ‘भीड़ का हिस्सा बनने के लिए’ लाया गया था। यह वाकया साफ दिखाता है कि धरातल पर बिना किसी काम के, सिर्फ कुर्सियां भरने वाली हवा-हवाई राजनीति चल रही है।एक तरफ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रात-दिन मेहनत करके जनता के बीच सरकार की साख बचा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कृषि मंत्री पूरी तरह अधिकारी तंत्र के भरोसे बैठे हैं। लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे गवाह हैं कि जनता और कार्यकर्ताओं की अनदेखी का क्या अंजाम होता है। यदि मंत्री जी ने अभी भी हवा-हवाई दौरों को छोड़कर अपने असली कार्यकर्ताओं जमीनी मंडल अध्यक्षों और बूथ स्तर के लोगों के साथ बैठकें शुरू नहीं कीं तो 2027 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर फिर से करारी शिकस्त झेलनी पड़ सकती है।एक सच्चे पत्रकार की बात आज कड़वी जरूर लग सकती है, लेकिन यह आईना है। अगर व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ अधिकारियों की लापरवाही पर सख्त एक्शन नहीं लिया गया और पत्रकारों के सवालों को गंभीरता से नहीं सुना गया तो आने वाला वक्त सत्ताधारी दल के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है।

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