नजूल से तहसील तक कब्जा: रवींद्रनाथ उपाध्याय गौरी शंकर वर्मा और रामखेलावन की कार्यशैली पर सवाल, क्या ईमानदार डीएम शशांक त्रिपाठी करेंगे इस अंगद के पांव का खात्मा।
अंतरिक्ष तिवारी
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अयोध्या के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है जिसने शासन की स्थानांतरण नीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। नजूल विभाग के नायब तहसीलदार रवींद्रनाथ उपाध्याय तहसील सदर के नायब तहसीलदार गौरी शंकर वर्मा और तहसील बीकापुर के नायब तहसीलदार रामखेलावन जैसे अधिकारियों ने अपनी कुर्सियों पर जैसे ‘अंगद के पांव’ जमा लिए हैं। शासन के स्पष्ट नियम हैं कि एक ही पद पर तीन वर्ष से अधिक समय तक तैनात अधिकारियों का स्थानांतरण अनिवार्य है, लेकिन इन अधिकारियों की पहुंच और पकड़ इतनी मजबूत है कि वे न केवल नियमों को ठेंगा दिखा रहे हैं बल्कि अपनी जगह से हिलने को भी तैयार नहीं हैं।सूत्र बताते हैं कि इन तहसीलों में फाइलों का भविष्य ‘चाहतों’ और पकड़ पर निर्भर करता है, जहाँ गलत को सही और सही को धूल फांकने के लिए मजबूर किया जा रहा है। बीकापुर और तहसील सदर में व्याप्त भ्रष्टाचार के किस्से अब आम हो चुके हैं और यदि मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल या अन्य शिकायतों का सर्वे किया जाए तो इन नायब तहसीलदारों की कार्यप्रणाली का काला चिट्ठा साफ सामने आ जाएगा। एक तरफ ये चुनिंदा अधिकारी और उनके चहेते व्यवस्था की दूध-दही-मलाई का आनंद ले रहे हैं, तो दूसरी तरफ शोषित, वंचित और पीड़ित जनता न्याय की गुहार लगाते हुए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।
अयोध्या की जनता अब बड़ी उम्मीदों के साथ नवनियुक्त जिलाधिकारी श्री शशांक त्रिपाठी की ओर देख रही है। जिलाधिकारी शशांक त्रिपाठी अपनी त्वरित कार्यप्रणाली और जनहितकारी निर्णयों के लिए चर्चा में हैं, और उनकी इस ईमानदार कार्यशैली ने आम जनता में एक नया विश्वास जगाया है। लोगों को पूरा भरोसा है कि वे इन अंगद रूपी अधिकारियों के गठजोड़ को तोड़कर न्याय का मार्ग प्रशस्त करेंगे। वहीं, प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के सुशासन और जीरो टॉलरेंस की नीति पर जनता को अटूट विश्वास है। प्रदेश की जनता को उम्मीद है कि मुख्यमंत्री जी के कड़े दिशा-निर्देशों के क्रम में इन प्रशासनिक विसंगतियों का संज्ञान लेकर न्यायसंगत कार्रवाई की जाएगी जिससे आम आदमी का शासन और प्रशासन पर भरोसा और अधिक मजबूत हो सके।
एक पत्रकार के तौर पर मेरी साख का पैमाना केवल मेरी रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि मेरी कलम से निकली हर उस पीड़ित की आवाज है, जो इन तहसीलों में न्याय की राह देख रहे हैं।