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अंतरिक्ष तिवारी की कलम से
अयोध्या। श्री राम जन्मभूमि मंदिर परिसर में हुए कथित दान चोरी जन धन और सोने-चांदी की हेराफेरी के बड़े प्रकरण को मोड़ने के लिए चली गई चालें अब खुद उल्टी पड़ती नजर आ रही हैं। मामले को राजनीतिक और जातिगत रंग देने के लिए जिस तरह यादव सरनेम का सहारा लेकर आरोपी टिन्नू यादव का संपर्क सीधे समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव से जोड़ने की कोशिश की गई वह सोशल मीडिया की अफवाहों तक ही सिमट कर रह गई। सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि टिन्नू और अखिलेश के कथित बातचीत का डाटा शायद कभी सामने न आए क्योंकि वह महज़ मुख्य साजिश से ध्यान भटकाने के लिए बुना गया एक फर्जी तंत्र मात्र था। लेकिन इस राजनीतिक ड्रामे के पीछे छिपे असली सच को खंगालना अब वक्त की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।जैसे ही समाजवादी पार्टी ने मजबूती से फ्रंट फुट पर आकर इन निराधार आरोपों को खारिज करते हुए कॉल रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने की चुनौती दी अफवाह तंत्र को तुरंत बैकफुट पर आना पड़ा। अब जब ध्यान भटकाने का यह खेल फेल हो चुका है तो सूत्रों और जनता की निगाहें सीधे नरेंद्र पर जाकर टिक गई हैं। परिसर में निगरानी कैमरों की देखरेख दान काउंटर वीआईपी पास से लेकर कर्मचारियों की भर्ती जिसमें रिज्यूम लेने साक्षात्कार करने और अंतिम नियुक्ति देने तक का पूरा जिम्मा अकेले संभालना शामिल था उसमें नरेंद्र की भूमिका अब सबसे बड़े संदेह के घेरे में है। कथित दान चोरी और सोने-चांदी की हेराफेरी के इस गंभीर मामले के बीच अब अंदरखाने से महिला कर्मचारियों के प्रबंधन और उनकी ड्यूटी लगाने के तरीकों को लेकर जो दावे सामने आ रहे हैंवे पूरी तरह से गहन जांच का विषय हैं।सूत्र यह बताते हैं कि मंदिर परिसर में कर्मचारियों की भर्ती और उनके कार्य प्रबंधन के दौरान नरेंद्र और उनके सहयोगियों की भूमिका को लेकर कुछ अंदरूनी सवाल उठ रहे हैं। दबी जुबान में आरोप लग रहे हैं कि महिला कर्मचारियों की ड्यूटी लगाने और उनके कार्य निर्धारण में भारी मनमानी व भेदभाव किया जा रहा था। चर्चाएं यहाँ तक हैं कि जो महिला कर्मचारी व्यवस्था के अनुकूल काम करती थीं उन पर विशेष नरमी बरती जाती थी और उन्हें उनके हिसाब से मनचाही ड्यूटी पर लगाया जाता था जबकि अन्य कर्मचारियों को प्रताड़ित होना पड़ता था। सूत्रों का दावा है कि कुछ पीड़ित महिला कर्मचारियों ने अंदर जाने के बाद वहां के कार्य परिवेश इस प्रशासनिक भेदभाव और अंदरूनी माहौल को देखने के बाद स्वेच्छा से अपनी नौकरियां छोड़ दीं । पूर्व में भी कुछ कर्मचारियों द्वारा परिसर की इस प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उच्च स्तर पर जाकर शिकायतें की गई थीं और वहां के जिम्मेदार लोगों को मौखिक रूप से अवगत कराया गया था लेकिन उस समय उन बातों पर कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। किसी के व्यक्तिगत जीवन चरित्र या किसी महिला की पहचान पर टिप्पणी करना हमारा उद्देश्य बिल्कुल नहीं है बल्कि अंदर की व्यवस्था में क्या कमियां थीं और वहां महिला कर्मचारियों की ड्यूटी में भेदभाव और इस्तीफों की नौबत क्यों आई, यह पूरी तरह से प्रशासनिक और कानूनी जांच का विषय है।हम लोग और क्षेत्र की जनता लगातार यही मांग उठा रही है कि इन गंभीर चर्चाओं को महज़ अफवाह मानकर खारिज न किया जाए बल्कि इन सभी आंतरिक पहलुओं की सघन जांच की जाए। इन सारे संवेदनशील और गंभीर दावों की असली हकीकत क्या है इसकी पूरी तफ्तीश विशेष जांच दल को करनी है और जब जांच एजेंसी इन सभी कड़ियों पर गहराई से काम करेगी, तभी सचमुच दूध का दूध और पानी का पानी हो पाएगा।यहाँ एक पत्रकार के रूप में हमारा यह स्पष्ट मानना है कि विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर ट्रस्ट या कोई भी अन्य सनातनी संगठन कभी गलत नहीं हो सकता। संगठन की विचारधारा हमेशा पवित्र और समाज कल्याण की होती है। लेकिन व्यवस्था के भीतर घुस आए कुछ चंद स्वार्थी और रसूखदार तत्व अपने निजी रसूख और स्वार्थ के लिए पूरे तंत्र की साख को बदनाम करने की कोशिश करते हैं जिन पर कड़ी कार्रवाई होना बेहद जरूरी है। एक पत्रकार का काम न तो कोई अंतिम निर्णय सुनाना है और न ही अदालत की तरह जज बनना है। पत्रकार का परम कर्तव्य केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण और फर्जी अफवाहों के पीछे छिपे असली कड़ियों और सवालों को जनता और शासन-प्रशासन के सामने लाना है। इस पूरे घटनाक्रम और व्यवस्था के पीछे छिपे अन्य चेहरों को लेकर हमारी पड़ताल लगातार जारी है और खबर के अगले भाग में कुछ और बड़ा सच जनता के समक्ष लाने का प्रयास किया जाएगा।

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