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जब प्रभु राम ने मर्यादा के लिए त्यागी थीं माता सीता तब संतों ने सिखाया था राजधर्म; आज कथित लापरवाही के आरोपों और जांच के बीच चंपत राय का पद बचाने में जुटा है ट्रस्ट और बचाव में उतरा है संत समाज क्या त्रेतायुग और कलयुग के संतों में यही है सबसे बड़ा अंतर

==================== अंतरिक्ष तिवारी की कलम से
अयोध्या। राम मंदिर के कथित दानपात्र मामले को लेकर मचे देशव्यापी बवाल के बीच अब अयोध्या का संत समाज खुलकर सामने आ गया है। अयोध्या में संतों की एक बड़ी बैठक हुई जिसमें शामिल सभी संतों ने एक सुर में चंपत राय का जोरदार समर्थन किया और मांग की कि जांच पूरी होने से पहले उनका इस्तीफा किसी भी कीमत पर स्वीकार न किया जाए। इस बैठक में भारी संख्या में स्थानीय संत और महंत मौजूद रहे जिन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बिना पक्के सबूत के किसी को भी दोषी ठहराना पूरी तरह गलत है।संत समाज भले ही चंपत राय के साथ खड़ा है लेकिन इस पूरे विवाद ने अयोध्या की साख और सनातन परंपराओं को लेकर कई गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। इतिहास गवाह है कि जब समाज में माता सीता को लेकर एक साधारण नागरिक ने सवाल उठाया तो प्रभु श्रीराम ने इस संकट से निकलने के लिए राजगुरु और अपने दरबार के ज्ञानी ऋषियों से रास्ता पूछा था। त्रेतायुग के संतों ने उन्हें यही मार्ग दिखाया था कि राजा का चरित्र ऐसा होना चाहिए जिस पर कोई उंगली न उठा सके। इसी सही सलाह का पालन करते हुए प्रभु राम ने लोक-मर्यादा और राजधर्म की रक्षा के लिए क्षण भर में अपनी जान से प्यारी अर्धांगिनी माता सीता का त्याग कर दिया था। उस दौर के महान ऋषियों ने हमेशा यही सिखाया था कि पद प्रतिष्ठा और शक्ति से बड़ा व्यक्ति का चरित्र और उसकी मर्यादा होती है। त्रेतायुग के संतों की यही सीख थी कि समाज में न्याय के लिए यदि राजा को अपने सुखों का भी त्याग करना पड़े तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए।ऐसे में आज सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या मर्यादा पुरुषोत्तम की इसी पावन नगरी में जहां राजा ने राजधर्म निभाने के लिए अपने व्यक्तिगत सुखों और परिवार का त्याग कर दिया था वहां आज के जिम्मेदार लोग उन महान आदर्शों को भूल चुके हैं करोड़ों रामभक्तों की आस्था के केंद्र में कथित लापरवाही जैसी इतनी बड़ी घटना सामने आने के बाद जहां व्यवस्था को लेकर कई तरह की बातें उठ रही हैं और जांच जारी है उसके बाद भी मंदिर संभालने वाले इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं।अब जनता के बीच से भी यह तीखा सवाल उठने लगा है कि जो लोग मंदिर की व्यवस्था संभाल रहे हैं यदि वे प्रभु श्रीराम की मर्यादा और उनके उस महान त्याग को ही नहीं सीख पाए, तो फिर वे किस हक से वहां बैठे हैं मंदिर में इतनी बड़ी कथित लापरवाही और विवाद होने के बाद भी यदि पद को छोड़ने के बजाय पद बचाने की राजनीति हो रही है तो समझदार लोगों के अनुसार यही हमारी पावन अयोध्या का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।सबसे बड़ी हैरत की बात तो यह है कि जो संत समाज त्रेतायुग में राजा को मोह छोड़ने और कड़े फैसले लेने का मार्ग दिखाता था आज कलयुग का वही संत समाज ऐसे आरोपों के बीच चंपत राय का बचाव करने के लिए ढाल बनकर उतर रहा है। जनता अब खुलेआम पूछ रही है कि क्या त्रेतायुग और कलयुग के संतों में यही सबसे बड़ा अंतर है क्या पद प्रतिष्ठा और व्यवस्था के प्रति ऐसा अत्यधिक मोह ही इस घोर कलयुग की वास्तविक शुरुआत हैइस पूरे घटनाक्रम पर जानकार लोगों और आम जनता के बीच यह भी चर्चाएं हैं कि सांसारिक व्यवस्थाओं और जांचों में चाहे जो भी रुख अपनाया जाए लेकिन उस परमपिता परमेश्वर की सबसे बड़ी अदालत में हर एक कर्म का सत्य और असत्य का पूरा हिसाब स्वतः तैयार हो जाता है जहाँ के न्याय से कोई नहीं बच सकता।
कानूनी रूप से कौन सही है और कौन गलत इसका फैसला देश की अदालत सबूतों के आधार पर ही करेगी, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जिस अयोध्या की पवित्र धरती ने पूरी दुनिया को त्याग का पाठ पढ़ाया आज उसी अयोध्या की दुनिया भर में ऐसी चर्चा क्यों हो रही है अगर आज पूरी अयोध्या की साख पर आंच आ रही है तो क्या मंदिर के नेतृत्व को स्वयं आगे बढ़कर जांच पूरी होने तक कुछ समय के लिए पद से दूर रहकर एक नया और बड़ा आदर्श स्थापित नहीं करना चाहिए था अब पूरे समाज की नजरें जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर टिकी हैं जो इस पूरे विवाद का सच्चा सच सामने लेकर आएंगी।

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