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अयोध्या का वो राज प्रभु श्रीराम की कुलदेवी देवकाली मंदिर में मूर्ति चोरी और मूर्ति विसर्जन दंगे के बाद आखिर क्यों मिला था पवन पांडेय को मंत्री पद का गिफ्ट

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अंतरिक्ष तिवारी की कलम से अयोध्या।रामनगरी अयोध्या में इन दिनों कथित दान चोरी और संपत्तियों को लेकर सियासी घमासान चरम पर है। इस विवाद ने पुराने उन जख्मों को दोबारा हरा कर दिया है जिन्हें अयोध्या की जनता भूली नहीं है। आज जो नेता इस मुद्दे पर मुखर हैं उनके खुद के राजनीतिक इतिहास और विवादित घटनाओं से जुड़े सस्पेंस पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि मार्च2012 में चुनाव जीतने और सपा सरकार बनने के तुरंत बाद अयोध्या के युवा चेहरा तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय को मंत्री क्यों नहीं बनाया गया उन्हें लगभग 11 महीने बीत जाने के बाद मंत्री पद का दर्जा क्यों मिला स्थानीय लोग बताते हैं कि इस अंतराल में अयोध्या ने दो बड़े जख्म झेले थे पहला प्रभु श्रीराम की कुलदेवी मां देवकाली के ऐतिहासिक मंदिर से प्राचीन मूर्तियों की चोरी और दूसरा दुर्गा पूजा मूर्ति विसर्जन के दौरान भड़का भीषण सांप्रदायिक दंगा। आरोप हैं संवेदनशील हालातों में बहुसंख्यक समाज की भावनाओं के विपरीत जाकर राजनीति करने वालों को तत्कालीन सपा प्रमुख को खुश करने के इनाम के तौर पर यह मंत्री पद सौंपा गया था।जैसे ही कथित राम मंदिर दान चोरी का यह ताजा मामला सामने आया वैसे ही सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर समाजवादी पार्टी के तमाम पुराने वीडियो बाबरी ढांचे का मामला रामगोपाल यादव और मुलायम सिंह यादव के पुराने विवादित वक्तव्य निकल-निकल कर वायरल होने लगे। इन तमाम चीजों को जनता के समक्ष रखकर राजनीतिक आईटी सेल दोनों समय की स्थितियों का नापतोल करने और इसे चुनावी नैरेटिव में भुनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इस सियासी घमासान के बीच हाल ही में सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी तीखा बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि जो लोग कभी सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने की बात करते थे और दंगों के बाद हिंदुत्व पर आक्रमण करने वालों के साथ खड़े होते थे आज वे दान चोरी पर ज्ञान बांट रहे हैं।हालांकि जमीनी हकीकत को देखें तो कुछ दलों को छोड़कर ना ही कोई सामाजिक संगठन और ना ही अयोध्या की आम जनता सड़कों पर कोई सीधा आक्रोश दिखा रही है। जनता और सामाजिक कार्यकर्ता पूरी तरह साइलेंट हैं। जब बिना कैमरे के ग्राउंड जीरो’ पर लोगों से तीखे सवाल पूछे जाते हैं तो लोग दबी जुबान में कहते हैं कि हम किसी को क्यों पसंद करें लोग अब यह तर्क भी दे रहे हैं कि इस पूरे मामले की जांच एसआईसी कर रही है चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा भी हो चुका है और आठ लोग जेल जा चुके हैं। प्रशासन लगातार संपत्तियों को खंगालकर रिकवरी की कार्रवाई कर रहा है। जिन वस्तुओं के गायब होने की बात विपक्ष कर रहा था या जिन भक्तों के मन में यह संदेह था कि हमारी वस्तुएं हमारे पास नहीं हैं वे वस्तुएं अब धीरे-धीरे सामने आ रही हैं। जनता का यह मौन साफ संकेत है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में अपने वोट से ही सब तय करेगी।ग्राउंड जीरो पर जब जनता साइलेंट होती है तभी हमारे हाथ कुछ छिपी हुई सच्चाइयां और पुख्ता सबूत लगते हैं। उन साक्ष्यों की गहन पड़ताल के बाद ही पूरी खबर को हम सामने रखते हैं। मुमकिन है कि इस निष्पक्ष और बेबाक लेखनी से कुछ लोगों को ठेस पहुंचती हो और कुछ को प्रसन्नता लेकिन सत्ता पक्ष गलती करे या विपक्ष दोनों से तीखे सवाल पूछना और लिखना मेरा कर्तव्य है। इसके बाद भी यदि कोई हमें अपना विरोधी मानता है या निजी दुश्मन समझता है तो वह केवल उसकी अपनी सोच हो सकती है। हो सकता है कि हम उनके राजनीतिक हितों या विचारों के अनुकूल काम न कर रहे हों इसलिए वे हमें नापसंद करते हों। यह उनका अपना नज़रिया हो सकता है, लेकिन हमारा किसी से कोई निजी द्वेष नहीं है। पत्रकारिता का हमारा यह तराजू हमेशा पूरी तरह निष्पक्ष और दोनों पक्षों के लिए बराबर रहेगा।

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