अयोध्या की सियासत में भूचाल: पूर्व जिलाध्यक्ष पारसनाथ यादव से सपा की दूरी क्या 2027 के लिए बदला लेने की तैयारी में है बीजेपी=

अंतरिक्ष तिवारी के कलम से
अयोध्या। रामनगरी अयोध्या की सियासत में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी अवधेश प्रसाद की ऐतिहासिक जीत और अखिलेश यादव के बगल में बैठकर भाजपा को बार-बार सियासी चिढ़ाने वाले दृश्यों के पीछे जिस शख्स की सबसे अहम भूमिका थी वो थे तत्कालीन सपा जिलाध्यक्ष पारसनाथ यादव। लेकिन अब इसी मजबूत कड़ी के दरकने की खबरें राजनीतिक गलियारों में आग की तरह फैल रही हैं। सूत्र बता रहे हैं कि पारसनाथ यादव की समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं से गहरी नाराजगी चल रही है जिसका सीधा फायदा उठाने की फिराक में भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जुट गया है।हाल ही में ज्ञानेश कुमार से जुड़ा मुद्दा हो नए जिलाध्यक्ष के स्वागत का कार्यक्रम हो या पार्टी के अन्य बड़े आयोजन पारसनाथ यादव ने इन सभी से स्पष्ट दूरी बनाकर रखी है। इस खामोशी और दूरी ने कई सियासी सवालों को जन्म दे दिया है। सूत्रों की मानें तो पारसनाथ यादव हाल ही में किसी कार्यक्रम को लेकर दूसरे राज्य की यात्रा से लौटे हैं। हालांकि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य क्या था, यह अभी रहस्य बना हुआ है लेकिन इसने राजनीतिक कयासबाजियों को जरूर हवा दे दी है। भाजपा के रणनीतिकार यह भली-भांति जानते हैं कि पारसनाथ यादव के पास अयोध्या जिले की पांचों विधानसभाओं का गहरा जमीनी गणित और अचूक रणनीतिक समझ है। यादव और ओबीसी समाज में उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुए भाजपा का मानना है कि इस वक्त अयोध्या में पारसनाथ से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। केंद्र और प्रदेश का भाजपा नेतृत्व पारसनाथ को अपने पाले में करने की पूरी कोशिश कर रहा है। रणनीति साफ है लोकसभा में मिली हार का बदला 2027 के विधानसभा चुनाव में पांचों सीटें जीतकर लिया जाए और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को यह संदेश दिया जाए कि जिस चेहरे के दम पर उन्होंने दिल्ली में हुंकार भरी थी उसी चेहरे को भाजपा ने अपने साथ मिलाकर सपा के गढ़ में सेंध लगा दी है।सियासत के इस खेल में दोनों ही दल एक-दूसरे पर नजर गड़ाए हुए हैं। एक तरफ जहां सूत्रों का कहना है कि टिकट की उम्मीद में भाजपा के कई नेता समाजवादी पार्टी कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं, तो वहीं भाजपा भी उसी आक्रामकता के साथ जवाब देने की तैयारी में है। भाजपा ने ऐसा दांव चला है कि सपा के कई बड़े ओबीसी और एससी समाज के नेता जल्द ही भगवा चोला ओढ़ सकते हैं।इन तमाम अटकलों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि पारसनाथ यादव कब बोलेंगे क्या वह भाजपा के पाले में जाकर सपा को बड़ा झटका देंगे या फिर “चाहे जितनी बड़ी कुर्बानी देनी पड़े” की तर्ज पर समाजवादी पार्टी का ही झंडा उठाते रहेंगे? जनता और राजनीतिक पंडितों की निगाहें इस बात पर भी टिकी हैं कि क्या सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव वक्त रहते डैमेज कंट्रोल कर पाएंगे और पारसनाथ यादव को मनाकर 2027 की विजय यात्रा में फिर से अपना सारथी बनाएंगे सवाल कई हैं और जवाब भविष्य के गर्भ में छिपे हैं। अयोध्या की इस सियासी बिसात पर अगली चाल क्या होगी और ऊंट किस करवट बैठेगा इस पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी। आगे जो भी अपडेट होगा उसकी पूरी और सटीक जानकारी हम आप तक पहुंचाते रहेंगे।